Hindi Shayari


hindi shayari


उग रहा है दर--दीवार से सब्ज़ा 'ग़ालिब'

हम बयाबां में हैं और घर में बहार आई है

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इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

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उन के देखे से जो जाती है मुंह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
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मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आंख ही से टपका तो फिर लहू क्या है

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़--बयां और

बाज़ीचा--अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे 
होता है शब--रोज़ तमाशा मिरे
आगे
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गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तश्ना--लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

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चंद तस्वीर--बुताँ, चंद हसीनों के खतूत
बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला
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फिर तेरे कूचे को जाता है ख्याल
दिल - -ग़म गुस्ताख़ मगर याद आया
कोई वीरानी सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया
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मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी
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तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे
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क़ासिद के आते -आते खत एक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में
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खुदा के वास्ते पर्दा रुख्सार से उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले
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तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख
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